धर्म की राजनीति को गिराते, मिसाल बने मंदिर/मस्जिद

आज के समय में जहां धर्म के नाम पर पक्षपात दिखाई देता है। अधिकतर हर जगह हर चैनल हर मीडिया पर किसी ना किसी घटना को किसी न किसी तरह किसी ना किसी धर्म से जोड़ दिया जाता है। चाहे कोई त्यौहार हो या कोई घटना जिम्मेदार किसी ना किसी धर्म को बना दिया जाता है। यहां तक के इस समय आई हुई कोरोनावायरस की बीमारी को भी धर्म का रूप देते लोग नजर आ रहे हैं। 



धर्म के बीच की बढ़ती दीवार जिसमें हिंदू और मुस्लिम धर्म देखने को मिलते हैं। कुछ लोगों ने राजनीति के चलते इन दो धर्मों के लोगों में जहर घोला है और घोल रहे हैं। परंतु ऐसी परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर में एक ऐसा मंदिर और मस्जिद भी है, जो एक दूसरे से जुड़े हैं। इन दोनों धार्मिक स्थलों की की दीवारें एक-दूसरे से जुड़ी हैं।



उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के टाटमिल चौराहे पर हिंदू मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक बना मंदिर और मस्जिद। अंग्रेजों के समय से यहां पर एक साथ एक दूसरे से जुड़े खड़े हैं मंदिर मस्जिद। इन दोनों मंदिर मस्जिद की स्थापना 1940 में की गई थी।


1940 से लेकर अब तक मंदिर मस्जिद में किसी तरह का कोई धार्मिक विवाद नहीं हुआ है। मंदिर में पूजा और मस्जिद में अजान अलग-अलग समय पर होती है। 1940 से अब तक हिंदू मुस्लिम के कई झगड़े देखने को मिले हैं परंतु इस स्थान पर ऐसा कोई भी विवाद नहीं दिखा। आपसी तालमेल से आज़ान और पूजा को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ।



मुस्लिम त्योहारों और हिंदू पर्वों पर भारी भीड़ होने के बावजूद भी कभी कोई अनबन देखने को नहीं मिली है। दोनों धार्मिक स्थलों के धर्मगुरुओं से अलग-अलग बयान लिए दोनों का यही कहना है कि हमने और हमारे समुदायों के लोगों को एक दूसरे से एक दूसरे के त्योहारों से कोई भी आपत्ति नहीं है। इसके अलावा एक दूसरे के त्योहारों में दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे की सहायता व सम्मान करते हैं। 


मंदिर के पंडित अभिषेक तिवारी जिनके स्वर्गवासी पिता श्री रामदास जी‌ जो पिछले 10 साल से मंदिर की सेवा कर रहे थे और उनके बाद अब मंदिर में उनके बेटे अभिषेक तिवारी बतौर पुजारी हैं। और मस्जिद में मोजिम अनवर अहमद हैं। दोनों धार्मिक स्थल के निगेहबान लोगों का कहना है, कि यहां पर मंदिर और मस्जिद एक सागर की तरह मिले हुए हैं।
वह लोग भी यह मानते हैं कि जब बनाने वाले ने इसे अलग नहीं समझा तो हम कैसे समझ सकते हैं।